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| चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) ने कसम खाई थी कि वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे. (तस्वीर: Wikimedia Commons) |
Chandra Shekhar Azad Birth Anniversary: चंद्रशेखर आजाद का नाम 1920 के दशक में भारत के शीर्ष क्रांतिकारियों (Revolutionary Freedom Fighters) में लिया जाता रहा. काकोरी षड़यंत्र (Kakori Conspiracy) से लेकर लाला लाजपतराय की मौत बदला लेने के लिए लाहौर कांड में सांडर्स हत्याकांड में उनका नाम प्रमुखता से आया. आजाद अपने साथियों में ही नहीं बल्कि जनसामान्य में भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं थी.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (Indian Freedom Movement) के इतिहास में देश के लिए समर्पित क्रांतिकारियों में अगर हमें आदर्श क्रांतिकारियों चुनने के लिए कई नाम आएंगे. रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह के साथ इनमें चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) का नाम भी आएगा. 23 जुलाई को आजाद कि जन्मतिथि है. आजादी के प्रति जैसा जज्बा चंद्रशेखर आजाद का था उसके भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कायल थे. वे अपने सभी क्रांतिकारी साथियों में बहुत ही प्रिय साथी के रूप में जाने जाते थे. वे एक बेहतरीन निशानेबाज और कुशल रणनीतिकार भी थे. उन्हें खुद को वचन दिया था कि वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे जिसे उन्होंने मरते दम तक निभाया.
भीलों के साथ रह कर सीखा निशाना लगाना
चंद्रशेखर आजाद तिवारी का जन्म 23 जुलाई 1906 को आलिराजपुर के भाभरा गांव, जो आज के मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में हैं, में हुआ था. उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी था. बचपन में ही चंद्रशेखकर का जीवन भीलों के बीच बीता जहां उन्होंने तीर कमान से निशाना लगाना सीख लिया. बालक चंद्रशेखर पर उनकी मां का बहुत प्रभाव था. वे चाहती थीं कि चंद्रशेखर संस्कृत में गहन अध्ययन करें और इसके लिए आजाद को काशी विद्यापीठ बनारस भी भेजा गया.
जज और आजाद का संवाद
लेकिन आजाद के मन में बचपन से ही देशभक्ति की भावना भरी हुई थी. 15 साल की उम्र में ही असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार कर लिया गया. अदालत में जज से हुआ उनका संवाद बहुत मशहूर हुआ और यहीं से उनके नाम के आगे आजाद जुड़ गया. बनारस में उनकी मुलाकात क्रांतिकारियों से हुई.
क्रांतिकारियों से संपर्क
1922 में जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन बंद करने का ऐलान किया देश भर के निराश युवाओं में आजाद भी थी. क्रांतिकारियों के संपर्क में वे आ चुके थे. ऐसे में उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई. और आजाद उनके हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ से जुड़ गए. शुरुआत में संघ ने असंगंठन की जरूरतों के लिए गरीबों पर जुल्म करने वाले अमीर लोगों को लूटने के कामशुरू किया लेकिन जल्द ही इस काम से उन्होंने तौबा कर ली.
उसूलों को नहीं छोड़ते थे आजाद
आजाद उसूलों के पक्के थे, लोगों से पैसा लूटते समय एक गांव में एक महिला ने आजाद से पिस्तौल छीन ली लेकिन आजाद ने उस महिला पर हाथ नहीं उठाया. ये बिस्मिल थे जिन्होंने उस महिला से पिस्तौल छीनी और आजाद को भी छुड़ाया. इसके बाद दल ने अपनी नीति बदली और नई नीतियों का पर्चे बांट कर प्रचार कर लोगों को उससे अवलगत भी कराया जिसमें सशस्त्र क्रांति द्वारा आजादी की बात की गई थी.
साथियों का सम्मान
आजाद साथी क्रांतिकारियों में बहुत सम्मान की नजर से देखे जाते थे. यहां तकि बिस्मिल और भगतसिंह तक उनकी बहुत इज्जत करते थे बिस्मिल की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए पैसा जमा करने आजाद बहुत ही कुशलता से काम करते थे. आजाद का पक्का निशाना और तेज दिमाग को देख कर ही बिस्मिल ने उन्हें क्विक सिल्वर नाम दिया था.
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| चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) साथियों में ही नहीं बल्कि जनसामान्य भी लोकप्रिय थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons) |
काकोरी और लाहौल कांड में आजाद
काकोरी षड़यंत्र ने क्रांतिकारी इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना थी. ट्रेन में जा रहे खजाने को लूटने के बाद क्रांतिकारियों को पुलिस ने एक के बाद एक सभी को पकड़ना शुरू किया, लेकिन चंद्रशेखर आजाद किसी के भी हाथ नहीं आ सके. वे ठिकाना बदलने में महिर थे. और लंबे समय तककभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए. इसके बाद लाला लाजपत रायकी मौत के बाद जब भगतसिंह ने इस घटना का बदला लेने का फैसला किया तो आजाद ने उनकापूरा साथ दिया और लाहौर में इस सांडर्स हत्याकांड में यह सुनिश्चित किया कि भगत सिंह पकड़े ना जाएं.
आजाद की लोकप्रियता का खुलासा उनकी मौत के बाद हुआ जब उनके अंतिम संस्कार में पुरुषोत्मदास टंडन और कमला नेहरू भी शामिल हुए थे. भारी संख्या में स्थानीय लोगों ने भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए. जहां बाकी क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने अपने प्रतिष्ठा के लिए पकड़ा था, वहीं आजाद का उनमें खौफ देखा जाता था. अंग्रेजों ने वह पेड़ तक जड़ से उखड़वा दिया था जिसकी आड़ में आखिरी बार वे अंग्रेजों से लड़े थे.





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